Sunday, January 1, 2012

सौ रूपये की नोट

निर्धन भिक्षु के क्षोभ का विलाप हो

या धनिक वणिक के लोभ का प्रलाप हो

सबके सबकुछ का सकल समाधान हूँ

क्यूंकि मैं सौ रूपये की हल्की हरी नोट हूँ,


रंग बदल सब आते जाते पर नाम मेरा ही गाते जाते

राजतन्त्र हो, प्रजातंत्र हो सब मेरे ही मंत्र बुझाते

सरकारों को दिशा दिखाता स्वायत्त स्वतंत्र संप्रभू हूँ

हाँ मैं सौ रूपये की हल्की हरी नोट हूँ


“प्रेम के स्वरुप” इश्वर को कौन नहीं जानता है?

पर ना केवल वह मुझे जानता है, पहचानता है

बल्कि मुझे ही चाहता है और मुझीको मांगता है

क्यूंकि मैं सौ रूपये की हल्की हरी नोट हूँ


हर ओर मेरा ही वर्चस्व, मेरी ही जुगत

पर तुम्हारे अस्तित्व से अलग मेरा क्या प्रमाण ?

जीवन में उपकरण मात्र, प्रयोजन कुछ और है

क्यूंकि मैं सिर्फ” सौ रूपये की हल्की हरी नोट हूँ